मृत्‍यु प्रमाण पत्र प्राप्‍त करना

मृत्‍यु प्रमाण पत्र क्‍या है इसकी आवश्‍यकता क्‍यों होती है?

मृत्‍यु प्रमाण पत्र एक दस्‍तावेज होता है जिसे मृत व्‍यक्ति के निकटतम रिश्‍तेदारों को जारी किया जाता है, जिसमें मृत्‍यु का तारीक तथ्‍य और मृत्‍यु के कारण का विवरण होता है। मृत्‍यु का समय और तारीख का प्रमाण देने, व्‍यष्टि को सामाजिक, न्‍यायिक और सरकारी बाध्‍यताओं से मुक्‍त करने के लिए, मृत्‍यु के तथ्‍य को प्रमाणित करने के लिए सम्‍पत्ति संबंधी धरोहर के विवादों को निपटान करने के लिए और परिवार को बीमा एवं अन्‍य लाभ जमा करने के लिए प्राधिकृत करने के लिए मृत्‍यु का पंजीकरण करना अनिवार्य है।


निवास स्‍थान प्रमाण पत्र क्‍या है इसकी आवश्‍यकता क्‍यों है?

निवास स्‍थान/निवास प्रमाण पत्र साधारणत: यह साबित करने के लिए जारी किया जाता है कि प्रमाण पत्र धारण करने वाला व्‍यक्ति उस राज्‍य/संघ राज्‍य क्षेत्र का निवासी है जिसके द्वारा प्रमाण पत्र जारी किया जा रहा है। इस प्रमाण पत्र की आवश्‍यकता निवास के प्रमाणप के रूप में होती है जिससे कि शैक्षिक संस्‍थानों और सरकारी सेवाओं में निवास स्‍थान/निवास का कोटा लिए जा सकते हैं और नौकरी के मामले में भी जहां स्‍थानीय निवासियों को वारीयता दी जाती है।


पिछड़ी जाति के लिए प्रमाण पत्र प्राप्‍त करना

जाति प्रमाण पत्र क्‍या करता है और इसकी आवश्‍यकता क्‍यों होती है?

जाति प्रमाण पत्र किसी के जाति विशेष के होने का प्रमाण है विशेष कर ऐसे मामले में जब कोई पिछड़ी जाति के लिए जाति का हो जैसा कि भारतीय संविधान में विनिर्दिष्‍ट है। सरकार ने अनुभव किया कि बाकी नागरिकों की तरह ही समान गति से उन्‍नति करने के लिए पिछड़ी जाति को विशेष प्रोत्‍साहन और अवसरों की आवश्‍यकता है। इसके परिणाम स्‍वरूप, रक्षात्‍मक भेदभाव की भारतीय प्रणाली के एक भाग के रूप में इस श्रेणी के नागरिकों को कुछ लाभ दिया जाता है, जैसा कि विधायिका और सरकारी सेवाओं में सीटों का आरक्षण, स्‍कूलों और कॉलेजों में दाखिला के लिए कुछ या पूरे शुल्‍क की छूट देना, शैक्षिक संस्‍थाओं में कोटा, कुछ नौकरियों में आवेदन करने के लिए ऊपरी आयु सीमा की छूट आदि। इन लाभों को प्राप्‍त करने में समर्थ होने के लिए पिछड़ी जाति के व्‍यक्ति के पास वैध जाति प्रमाण पत्र होना जरूरी है।



अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए प्रमाण पत्र प्राप्‍त करना

कानून द्वारा यथा पारिभाषित अनुसूचित जनजाति

अनुसूचित जनजाति भारत के विभिन्‍न राज्‍यों और संघ राज्‍य क्षेत्रों में पायी जाती है। स्‍वतंत्रता के पहले की अवधि में संविधान के अधीन सभी जनजातियों को ''अनुसूचित जनजाति'' के रूप में समूहबद्ध किया गया था। अनुसूचित जनजाति के रूप में विनिर्दिष्‍ट करने के लिए अपनाए गए मानदंडों में निम्‍नलिखित शामिल हैं: निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पारम्‍परिक रूप से निवास करना। विशिष्‍ट संस्‍कृति जिसमें जनजा‍तिय जीवन के सभी पहलू अर्थात भाषा, रीति रिवाज, परम्‍परा, धर्म और अस्‍था, कला और शिल्‍प आदि शामिल हैं। आदिकालीन विशेषताएं जो व्‍यावसायिक तरीके, अर्थव्‍यवस्‍था आदि को दर्शाता है। शैक्षिक और प्रौद्योगिकीय आर्थिक विकास का अभाव। राज्‍य विशेष/संघ राज्‍य क्षेत्र विशेष संबंधी अनुसूचित जनजाति का विनिर्देशन संबंधित राज्‍य सरकार के साथ किया गया। इन आदेशों को बात में परिवर्तित किया जा सकता है यह‍ संसद के अधिनियम द्वारा किया जाता है। भारत के संविधान के अनुच्‍छेद 342 के अनुसार संबंधित राज्‍य सरकार के साथ परामर्श करने के पश्‍चात राष्‍ट्रपति में अब तक 9 आदेश लागू किए हैं जिनमें संबंधित राज्‍य और संघ राज्‍य क्षेत्रों के संबंध में अनुसूचित जा‍ति को विनिर्दिष्‍ट किया गया है।



विकलांग प्रमाण पत्र

विकलांग प्रमाण पत्र स्‍वास्‍थ्‍य निगम द्वारा उन लोगों को जारी किया जाता है, जो कि जन्‍म से या फिर अपने जीवनकाल में किसी कारणवश अपाहिज होते है, और जो कि विकलांगता के प्रकार एवं प्रतिशत पर निर्भर करता है। विकलांग प्रमाण पत्र शैक्षिक संस्‍थानों में, रोजगार तथा अन्‍य सरकारी कल्‍याण योजनाओं के लिये जारी किया जाता है।

योग्‍यता की शर्ते

कोई भी विकलांग व्‍यक्ति विकलांग प्रमाण पत्र के लिये योग्‍य है।

प्रक्रिया

आवेदन करने के लिये आवेदक को नियत फार्म को पूरा कर तथा बताये गये सारे दस्‍तावेज के साथ आवेदन करना होता है। इसके बाद आवेदक की जांच स्‍वास्‍थ्‍य निगम द्वारा की जाती है तथा उसकी विकलांगता तथा विकलांगता का प्रतिशत पूर्व निर्धारित नियमों के आधार पर तय किया जाता है।



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